Ranchi : झारखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (Jharkhand University of Technology), जिसे झारखंड टेक्निकल यूनिवर्सिटी अधिनियम 2011 के तहत 2015 में स्थापित किया गया था, आज अपनी अस्तित्व की जंग लड़ रहा है. भले ही विश्वविद्यालय की स्थापना को सात वर्ष हो चुके हैं, लेकिन अब तक शासी निकाय का गठन नहीं हो पाया है, जो विश्वविद्यालय के संचालन और विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. इसके परिणामस्वरूप, विश्वविद्यालय में शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यों में गंभीर अव्यवस्था देखने को मिल रही है.
कुलपति प्रोफेसर गोपाल पाठक के नेतृत्व में 15 जून 2017 को विश्वविद्यालय की शुरुआत हुई थी, लेकिन अब तक शासी निकाय की बैठकें आयोजित नहीं हो पाई हैं. शासी निकाय का गठन विश्वविद्यालय के अधिनियम की धारा 16 के तहत अनिवार्य है, जिसमें कुलाधिपति को चेयरमैन और कुलपति को सचिव के रूप में कार्य करने का प्रावधान है.
- शैक्षणिक परिषद और कार्य परिषद की अस्थायी व्यवस्था : पूर्व राज्यपाल श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के कार्यकाल में अस्थायी रूप से कार्य परिषद और शैक्षणिक परिषद का गठन किया गया था. यह निर्णय लिया गया था कि जल्द ही सरकार द्वारा नियमावली प्रदान की जाएगी, जिसके बाद इन परिषदों का पुनर्गठन किया जाएगा. लेकिन आज तक यह अस्थायी व्यवस्था जारी है, जिसके कारण विश्वविद्यालय के संचालन में गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं.
- वित्तीय और प्रशासनिक संकट : वर्तमान में वित्तीय मामलों के लिए कोई स्थायी वित्त समिति का गठन नहीं हो सका है. इसके साथ ही वित्त पदाधिकारी का पद भी रिटायर्ड अधिकारियों द्वारा संभाला जा रहा है. पिछले पाँच वर्षों से विश्वविद्यालय बिना परिनियम के ही संचालित हो रहा है, और परीक्षा संचालन के लिए भी नियमावली राज्यपाल सचिवालय से अधिसूचित नहीं हो पाई है.
- नियुक्ति नियमावली की कमी : यूनिवर्सिटी में अब तक नियुक्ति नियमावली अधिसूचित नहीं की गई है, जिससे 91 पदों पर सीधी नियुक्ति प्रक्रिया अटकी हुई है. यही कारण है कि वर्तमान कुलपति के पद को छोड़कर अन्य सभी पदों पर नियुक्तियां नहीं हो पा रही हैं.
- शैक्षणिक संकट : झारखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में कुल पाँच पीजी विभागों का संचालन होना था, लेकिन अब तक सिर्फ तीन विभाग ही संचालन में हैं, जिनमें से दो विभाग घंटी आधारित शिक्षकों पर निर्भर हैं. इसके कारण छात्रों को उच्च तकनीकी शिक्षा के अवसरों से वंचित होना पड़ रहा है और राज्य में प्रतिभाओं का पलायन हो रहा है.
- भवन की खंडहर स्थिति : सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च कर विश्वविद्यालय के लिए भव्य भवन तैयार किया था, लेकिन वर्तमान में अधिकांश भवन खंडहर में बदल चुका है, जो विश्वविद्यालय के अस्तित्व पर सवाल खड़ा कर रहा है.
- कुलपति की नियुक्ति और अन्य प्रशासनिक समस्याएं : वर्तमान कुलपति डॉ. डी. के. सिंह के बारे में यह भी चर्चा है कि वे बिरसा प्रौद्योगिकी संस्थान, सिंदरी से एम.टेक. करने के बाद उसी संस्थान से वेतन प्राप्त कर रहे थे. इसके अलावा, विश्वविद्यालय के अन्य महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां नहीं होने के कारण शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं.
- रिक्त पदों पर त्वरित नियुक्ति की आवश्यकता : यूनिवर्सिटी के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए राज्य सरकार से आग्रह किया गया है कि वह सभी रिक्त पदों पर योग्य और अनुभवी पदाधिकारियों और कर्मियों की त्वरित नियुक्ति करे. इसके अलावा, शासी निकाय का गठन किया जाए, दो पीजी डिग्री कोर्स शुरू किए जाएं और छात्रों के प्रतिनिधियों का चयन किया जाए.
अगर यह स्थिति बनी रही, तो आने वाले समय में विश्वविद्यालय के संचालन पर गंभीर प्रश्न उठ सकते हैं, और उच्च तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है.
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